Tuesday, 7 January 2014

आज भी तुम वहीं खड़ीं थीं

आज भी तुम वहीं खड़ीं थीं 


क्यों 
क्यों नहीं बता देती उसको 
तुम भी मरती हो 
रोज़ 
रोज़ उसके खौफ से 
उतरती सिर्फ नीचे 
उतरती हो 
आज भी वो आएगा 
मलहम लेकर 
शायद आज फिर रोंधेगा 
उस शरीर को 
जिसे झोंक कि तरह वक़्त ने 
पी लिया है 

क्यों 
क्यों नहीं कह देती 
बस अब नहीं 
अब नहीं मर पाउंगी 
रोज़ हज़ारों कीड़ों के सामान 
एक साथ 
उसके भद्दे हाथ 
नहीं सहला पाउंगी 
नहीं जी पाउंगी सिर्फ बेटे 
के लिए 

क्यों 
क्यों नहीं आवाज़ उठाती तुम 
बस घंटों मेरा सर खाती हो 
अपनी ग्लानि यहाँ उड़ेलती हो 
बस इसीमे हलकी हो जाती हो 
एक कदम उठाती नहीं 
और बरसों और दर्द 
चुकाना चाहती हो 

- शालिनी