Friday, 21 March 2014

हर बार

हर बार कि तरह इस बार भी 
बेधड़क से तुम
मुँहफट से तुम
कितनी किरचने कचोटते तुम
कितनी ही बेखयाली में तुम
कुछ में बहुत कुछ कह गए
तुम
कई बार हैरान हो जाती हूँ
इतनी चोटें कैसे पी जाती हूँ
कितना घोल लेती हूँ 
खुद को मैं
जैसे पानी का बुलबुला हूँ
या सिर्फ साढ़े पांच फिट कि
अभूझ पहेली हूँ मैं
मगर
तुम
तुम कुछ भी कह लेते हो
उड़ेल देते हो कहीं भी मन को
और मैं
बस समेटती हूँ
खुद को और
तुम को भी
तुम आंधी कि तरह
उजाड़ते हो
कभी मुझे
तो कभी सपने को
और मैं
बस बहारती हूँ
कभी खुद को
कभी उस घर को
और तुम
कभी भी फिर से एक फूंक से
उड़ा देते हो
कभी इस घर को
कभी मुझे। …।

शालिनी

No comments:

Post a Comment