पहली किलकारी कितनी मासूम कितनी खूबसूरत होती है . ऐसा लगता है जैसे इतना दर्द सहने के बाद ईश्वर ने एक प्यारा सा तोहफा दाल दिए हो आपकी झोली में . अर्णव जब पैदा हुआ उसके पहले के दिन शायद मेरे लिए भयानक सपने से थे . वो पांच दिन जिसमे रह रह कर दिन में तारे से दिखाने वाला दर्द आज भी नहीं भूल पाती हूँ . उन दिनों में कई बार ज्ञान को भी मेरा साथ झूटता सा दिखा था . कई बार उन्हें रोते बिलखते और आंसुओं को छुपाते देखा था . वो निर्णायक 1 8 घंटे कितने कम्पानेवाले रहे . और ये सब अपने देश से दूर और अपने लोगो से दूर . कहते हैं अगर माँ नज़दीक हो तो बच्चे बहुत कुछ सहते चले जाते हैं . लेकिन मुझे वो नसीब नहीं हुआ . जब नब्ज़ ऊपर नीचे होने लगी तब डॉक्टर ने ओटी का रास्ता दिखाया .
अर्णव जब 9 महीने माँ के अंदर आराम फार्म रहे थे तब तक सब ठीक रहा . ब्रिटेन के छोटे से शहर हेमल में बिताये वो बेफिक्री भरे 9 महीने बड़े मज़ेदार रहे . मैं किसी प्रिंसेस से कम नहीं थी . मिडवाइफ से हर मुलाकात में ख़ुशी और उत्साह होता था .शायद ही किसी appointment ने मुझे गहरी सोच या डर में डाला हो .इन 9 महीनो को अगर मैं अवीरा के दौरान बिताये खौफनाक दिनों और लगभग रोज़ एक बुरी खबर के साथ ... बहुत सी परेशानियों से लैस डॉक्टर से मिलकर लौटती रही .इस बार मैं नॉएडा (इंडिया ) में थी .यहाँ मैं अपने देश के डॉक्टर कि कमियां नहीं निकाल रही . मगर ये सभी मेरे अनुभव हैं . जब मैं मीडिया का हिस्सा थी तब लगभग रोज़ मैं डॉक्टर से मिलती थी कई बहुत बेहतरीन इंसानों से मिली जो आज भी मेरे दोस्त हैं . बहरहाल उन दिनों मैं लगभग रोज़ ही रोती थी . ज्ञान को कभी इन बातों से फर्क नहीं पड़ता था . मुझे लगता था जैसे इन भयानक सी बातों को मैं अकेली ही सह रही हूँ . किसी तरह सरक सरक के दिन निकल रहे थे . हर मुलाकात पर डॉक्टर नए और बेहद महंगे टेस्ट करवा रही थीं . मैं खुद रिपोर्टर होते हुए भी अपनी लड़ाई नहीं लड़ पा रही थी . टेस्ट फलां फलां सेंटर से ही करवाने का मतलब भी जानती थी . कभी 20 हज़ार का टेस्ट
बताया जाता तो कभी बच्चे कि ग्रोथ पर सवाल उठाया जाता . हालाँकि इन हर ऐसे टेस्ट के बाद मैं अपनी डॉ दोस्त जो इंदौर में थी बताती ... वो हर बार इससे गैरजरूरी बताती . हम बुरी तरह से पस्त हो चुके थे और हमने फैसला किया कि इंदौर जाना बेहतर रहेगा . इंदौर मेरा होमटाउन है इसलिए यहाँ कहाँ जाना है और किसे चुनना है मुझे पता था . यहाँ मैंने आगे का भार डॉ . शीला त्यागी पर डाला . मुझे हमेशा कि तरह इस बार भी मेरे शहर ने निराश नहीं किया . यहाँ वो सभी बातें जो लगातार नॉएडा के डॉक्टर कह रहे थे कि बच्चा बचने के लगभग 50 % कि चांस हैं गलत साबित हुए और अवीरा नॉर्मल डिलीवरी से हुई . यहाँ मिली देखभाल के सामने लंदन भी फ़ैल हो गया . भारत के दो शहरों में कितना बड़ा अंतर था .
कितनी अजीब सी बात है न ....अपने ही देश में अलग अलग जगह अलग अलग लोग… उनके ईमानदारी के अलग मापदंड ...जैसे मरीज़ इंसान ही नहीं ...काश नॉएडा कि उस डॉक्टर ने एक बार सोचा होता कि हर हफ्ते ऐसी ख़बरों के बोझ तले मैं कैसे जीती होंगी ... ऐसे मेरे ही नहीं बहुत सी माओं के साथ घटा होगा ... अगर मैंने इंदौर जाने का फैसला न किया होता तो ऑपरेशन पक्का था . मुझे आज भी याद है जब मैंने डॉक्टर को बताया कि मैं अपनी माँ के घर जाना चाहती हूँ तब उन्हें कितना बड़ा झटका लगा था . बात सिर्फ चंद रुपयों कि कतई नहीं है .. वो तो खैर कंपनी दे देती है… बात उस स्ट्रेस कि है जो इस समय कोसो दूर होना चाहिए .. जिन दिनों को उत्सव कि तरह मनाना चाहिए उसे मैंने बेहद तनाव में गुज़ारे ...
अर्णव जब 9 महीने माँ के अंदर आराम फार्म रहे थे तब तक सब ठीक रहा . ब्रिटेन के छोटे से शहर हेमल में बिताये वो बेफिक्री भरे 9 महीने बड़े मज़ेदार रहे . मैं किसी प्रिंसेस से कम नहीं थी . मिडवाइफ से हर मुलाकात में ख़ुशी और उत्साह होता था .शायद ही किसी appointment ने मुझे गहरी सोच या डर में डाला हो .इन 9 महीनो को अगर मैं अवीरा के दौरान बिताये खौफनाक दिनों और लगभग रोज़ एक बुरी खबर के साथ ... बहुत सी परेशानियों से लैस डॉक्टर से मिलकर लौटती रही .इस बार मैं नॉएडा (इंडिया ) में थी .यहाँ मैं अपने देश के डॉक्टर कि कमियां नहीं निकाल रही . मगर ये सभी मेरे अनुभव हैं . जब मैं मीडिया का हिस्सा थी तब लगभग रोज़ मैं डॉक्टर से मिलती थी कई बहुत बेहतरीन इंसानों से मिली जो आज भी मेरे दोस्त हैं . बहरहाल उन दिनों मैं लगभग रोज़ ही रोती थी . ज्ञान को कभी इन बातों से फर्क नहीं पड़ता था . मुझे लगता था जैसे इन भयानक सी बातों को मैं अकेली ही सह रही हूँ . किसी तरह सरक सरक के दिन निकल रहे थे . हर मुलाकात पर डॉक्टर नए और बेहद महंगे टेस्ट करवा रही थीं . मैं खुद रिपोर्टर होते हुए भी अपनी लड़ाई नहीं लड़ पा रही थी . टेस्ट फलां फलां सेंटर से ही करवाने का मतलब भी जानती थी . कभी 20 हज़ार का टेस्ट
बताया जाता तो कभी बच्चे कि ग्रोथ पर सवाल उठाया जाता . हालाँकि इन हर ऐसे टेस्ट के बाद मैं अपनी डॉ दोस्त जो इंदौर में थी बताती ... वो हर बार इससे गैरजरूरी बताती . हम बुरी तरह से पस्त हो चुके थे और हमने फैसला किया कि इंदौर जाना बेहतर रहेगा . इंदौर मेरा होमटाउन है इसलिए यहाँ कहाँ जाना है और किसे चुनना है मुझे पता था . यहाँ मैंने आगे का भार डॉ . शीला त्यागी पर डाला . मुझे हमेशा कि तरह इस बार भी मेरे शहर ने निराश नहीं किया . यहाँ वो सभी बातें जो लगातार नॉएडा के डॉक्टर कह रहे थे कि बच्चा बचने के लगभग 50 % कि चांस हैं गलत साबित हुए और अवीरा नॉर्मल डिलीवरी से हुई . यहाँ मिली देखभाल के सामने लंदन भी फ़ैल हो गया . भारत के दो शहरों में कितना बड़ा अंतर था .
कितनी अजीब सी बात है न ....अपने ही देश में अलग अलग जगह अलग अलग लोग… उनके ईमानदारी के अलग मापदंड ...जैसे मरीज़ इंसान ही नहीं ...काश नॉएडा कि उस डॉक्टर ने एक बार सोचा होता कि हर हफ्ते ऐसी ख़बरों के बोझ तले मैं कैसे जीती होंगी ... ऐसे मेरे ही नहीं बहुत सी माओं के साथ घटा होगा ... अगर मैंने इंदौर जाने का फैसला न किया होता तो ऑपरेशन पक्का था . मुझे आज भी याद है जब मैंने डॉक्टर को बताया कि मैं अपनी माँ के घर जाना चाहती हूँ तब उन्हें कितना बड़ा झटका लगा था . बात सिर्फ चंद रुपयों कि कतई नहीं है .. वो तो खैर कंपनी दे देती है… बात उस स्ट्रेस कि है जो इस समय कोसो दूर होना चाहिए .. जिन दिनों को उत्सव कि तरह मनाना चाहिए उसे मैंने बेहद तनाव में गुज़ारे ...
enjoyed reading it shalini
ReplyDeleteThanx
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